30 सितंबर 2017

कोडी

चंद्र होता रात्रवेडा, रात्र होती सूर्यवेडी
सूर्य होता सांजवेडा, सांज होती चंद्रवेडी 
ओढ कोणाला कुणाची, आणि तिटकारा कुणाचा 
अंतरिक्षाला स्वतःलाही न सुटली गूढ कोडी               ॥ धृ ॥ 

वेध धूसर धूमकेतूचे खुळ्या पृथ्वीस होते 
कैक शतकांची प्रतीक्षा, मीलनाचे स्वप्न खोटे 
एकदा फिरकून तो काढून गेला फक्त खोडी               ॥ १ ॥ 

मोह धरणीला उन्हाचा, चांदण्याचीही तृषा 
कैफ थंडीचा गुलाबी, पावसाचीही नशा 
भोग इतके चाखले की, राहिली न कशात गोडी           ॥ २ ॥ 

आजन्म सूर्याभोवती पिंगा ग्रहांनी घातला 
पण सूर्य अंधारात अज्ञातास धुंडत राहिला 
जिथल्या तिथे सगळेच, पण जमली कुणाचीही न जोडी  ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१६-३०/०९/२०१७)

11 सितंबर 2017

तालाब

हाँ, दोष है तालाब का, जो खुद ही मचला था कभी 
अब तक न स्थिर जो हो सका, आए गए मौसम सभी 

वो खुद-ब-खुद ही शांत हो जाता, न होता, क्या पता ? 
पर चंद कंकड फेकने की तो किसी की थी खता 

साबित न कुछ करना, न अब देनी दलीलें अनकही 
जिसने शरारत की, उसे एहसास है, काफी यही 

मालूम है तालाब को अपनी हदें, ना हो फिकर 
उडने न देगा छींट भी तट पर खडे नादान पर 

- अनामिक 
(०७-११/०९/२०१७) 

04 सितंबर 2017

ये रात है.. ये राह है..

ये रात है.. ये राह है.. ये साथ है.. ये चाह है.. 
इस चाह की इस राह पर हम तुम सनम गुमराह हैं 

ये बादलों की बोतलों में बिजलियों के जाम हैं 
पी ले इन्हे, ये दिल बहकने का रसीला माह है 

ना है जमाने की फिकर, ना हैं समय की बंदिशें 
कसकर मुझे लिपटी हुई नाजुक तुम्हारी बाह है 

हम बेसबब चलते रहे, मंजिल मिले, ना भी मिले 
खो भी गए इक-दूसरे में, क्या हमें परवाह है ? 

थककर कभी रुक भी गए, भरना मुझे आगोश में 
उस मखमली आगोश सी दूजी न कोई पनाह है 

- अनामिक 
(०६/०८/२०१७ - ०४/०९/२०१७) 

31 अगस्त 2017

अखेरचे हे गीत सखे

हे गीत कदाचित अखेरचे 
यानंतर तुझे न शब्द सखे 
जे द्वार तुझ्यास्तव सताड उघडे 
करेन म्हणतो बंद सखे 

                                   उतरेल जरी पानावर शाई 
                                   तुझे न येइल नाव सखे 
                                   चालेल अक्षरांचा प्रवास, पण 
                                   तुझे न येइल गाव सखे 

उठतील कल्पनांच्या लाटा 
पण नसेल तुझा तरंग सखे 
फिरतील कुंचले स्वप्नांचे 
नसतील तुझे पण रंग सखे 

                                   डुंबेन विचारांच्या डोही 
                                   पण तुझे नसेल प्रतिबिंब सखे 
                                   झरतील सरीही कवितांच्या 
                                   नसतील तुझे पण थेंब सखे 

मोगरा सुरांचा दरवळेल 
पण नसेल तुझा सुगंध सखे 
घुमतील बासरीचे स्वरही 
पण नसेल तुझा निनाद सखे 

                                   ते स्वप्न भरजरी होते, पण 
                                   वास्तवास नव्हता वाव सखे 
                                   थांबवतो अता खुंटलेला हा 
                                   बुद्धिबळाचा डाव सखे 

- अनामिक 
(२५-३१/०८/२०१७) 

27 अगस्त 2017

सखे

मी करेन म्हणतो कैद तुला, शब्दांचे घेउन रंग सखे 
पण नजर तुला भिडताच तुझ्या रंगातच होतो गुंग सखे 
तू समोर असता, सांग सखे, मी भान स्वतःचे कसे जपू ? 
आरस्पानी अस्तित्व तुझे मी कवितेमधुनी कसे टिपू ?   ॥ धृ ॥ 

ही वीज तुझ्या डोळ्यांमधली 
ही जुई तुझ्या ओठांवरली 
ही सांजेची लाली गाली 
हा सूर्याचा ठिपका भाळी 
हा मोरपिसासम स्पर्श फुलवतो मनी सहस्त्र तरंग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ १ ॥ 

हा वादळवारा केसांचा 
हा धुंद मोगरा श्वासांचा 
हा देह चिमुकला चिमणीचा 
पण डौल जणू फुलराणीचा 
मी काय लिहू, अन्‌ काय नको ? उपमांची मोठी रांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ २ ॥ 

हे गूढ इशारे नजरांचे 
हे गहन भाव चेहऱ्यावरले 
हे गुपित मंद स्मितहास्याचे 
हे लक्ष शब्द मौनामधले 
मी खोल उतरतो तुझ्या अंतरी, तरी न लागे थांग सखे 
मी भान स्वतःचे कसे जपू, तू समोर असता ? सांग सखे ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(१५-२७/०८/२०१७) 

23 अगस्त 2017

दिल फिसलने की घडी

मदहोश बादल, धुत समा, बेताब बूँदों की झडी 
ऐसे समय तुम रूबरू बारिश लपेटे हो खडी 
तुम ओंस में भीगी हुई जैसे कमल की पंखुडी 
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी 

भीगी लटों से हैं टपकती मोतियों की ये लडी 
ये ठंड से कांपता बदन, पर है नजर में फुलझडी 
पलखें झपकती ही नही, तुम पर निगाहें जो जडी 
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी 

गुस्ताखियाँ गर हो गयी, तो दोष ये किसका कहे ? 
मेरा? तुम्हारा? इश्क? या बदमाश बारिश का कहे ? 
ऐसे न उतरेगी, मुझे जो रूप की मदिरा चढी 
रोकू, संभालू, जो करू.. है दिल फिसलने की घडी 

- अनामिक 
(२७/०७/२०१७, २१-२३/०८/२०१८)

13 अगस्त 2017

कभी ना हो खतम

ये दिन खतम ना हो कभी, ये रात भी ना हो खतम
ये बेसमय चलती हमारी बात भी ना हो खतम 

ये तितलियों के काफिलें, ये जुगनुओं की महफिलें
ये चाँदनी की मदभरी बरसात भी ना हो खतम 

ये रंग हया का शरबती, लब पे हसी की चाशनी
दिल से छलकते शबनमी जजबात भी ना हो खतम 

तरकीब कुछ हम खोज ले, सुइयाँ घडी की रोक ले
पर ख्वाब सी ये जादुई मुलाकात भी ना हो खतम 

ये दो कदम का रासता, ये सौ जनम का वायदा
ये उम्रभर के साथ की शुरुआत भी ना हो खतम 

- अनामिक 
(०६-१३/०८/२०१७) 

23 जुलाई 2017

आर या पार

बहोत हो चुकी लुक्का-छुप्पी, कुछ तो तय इस बार करो 
करना है तो प्यार करो.. वरना सीधा वार करो 

मन के फिजूल खेल न खेलो, नये पैंतरे तो सोचो 
घिसीपिटी सब तरकीबों से दिल का फिर न शिकार करो 

टुकडे टुकडे हो जाए दिल, ऐसा तेज प्रहार करो 
मिर्च रगड दो सब जख्मों पर, दर्दों से बेजार करो 

या फिर छू लो होले से दिल, नर्म हाथ से दस्तक दो 
प्रीत की रिमझिम बारिश से दिल की जमीन गुलजार करो 

चूहे-बिल्ली वाले खेल में मुझे न अब दिलचस्पी है 
मान से दिल में पनाह दू, पर शान से चौखट पार करो 

प्यार करो या वार करो.. पर जो है, आर या पार करो 

- अनामिक 
(१०-२३/०७/२०१७) 

16 जुलाई 2017

बारिशें

ये बादलों की सिलवटें
सागर-लहर की करवटें
हैं बिजलियों की आहटें
ये तेरी लहराती लटें

                            ये मौसमों की साजिशें
                            ये मोतियों की बारिशें
                            भीगा जहाँ, हम दो यहा
                            क्या और हो फर्माइशें ? 

इन उंगलियों को छेडता
ये हाथ तेरा रेशमी
जैसे क्षितिज पे मिल रही
बेताब अंबर से जमीं 

                            कितना नशा इस रैन में
                            और जाम तेरे नैन में
                            प्याला जिगर का भर लिया
                            फिर भी बडा बेचैन मैं 

तेरी मोहब्बत की झडी
यूँ ही बरसती जो रही
मेरे संभलने की भला
फिर कोई गुंजाइश नही 

- अनामिक
(१५/०७/२०१७) 

13 जुलाई 2017

जवाब

करने को तो जंग भी कर लू, ईट का जवाब पत्थर से दू
सब तानों का, अपमानों का हिसाब तीखे अक्षर से दू
मगर क्या करू ? शायर जो हूँ, शायर का ये धरम नही
काँटें भी दे मारे कोई, गुलाब महके इत्तर से दू

कलम हाथ में है नाजुक सी, नोकीली तलवार नही
इश्क छलकता है इससे, इसमें रंजिश की धार नही
हर किस्सा इक नज्म बनेगी, जंग कर लो, या समझौता
दिल जीतेगी दुश्मन का भी, इसकी किस्मत हार नही

- अनामिक
(२६/०४/२०१६, १२,१३/०७/२०१७)

01 मई 2017

राधिका

कृष्ण छेडे बासरी 
आर्त यमुनेच्या तिरी 
राधिका येई न अजुनी 
गोपिका जमल्या तरी 

"का असा रुसवा गडे ?" 
प्रश्न कृष्णाला पडे 
साद व्याकुळ बासरीची 
उंच जाई अंबरी                                   ॥ धृ ॥ 

बासरीचे सूर भिरभिरती खुळे वाऱ्यासवे 
राधिकेचा ठाव घेण्या त्यास करती आर्जवे 
सांगती, "संदेश आतुर दे तिच्या जाउन घरी" 
कृष्ण छेडे बासरी                                 ॥ १ ॥ 

राग लटका दोन घटका, पण चिरंतर प्रीत आहे 
भाबड्या ओठांत कृष्णाचाच जप अन् गीत आहे 
वास कृष्णाचाच आहे राधिकेच्या अंतरी 
कृष्ण छेडे बासरी                                 ॥ २ ॥ 

- अनामिक
(२९/०४/२०१७, ०१/०५/२०१७)

28 अप्रैल 2017

पुष्कळ झाली फुले अबोली

पुष्कळ झाली फुले अबोली, गुलाबास चल देऊ संधी 
संवादाचा फोडू पाझर, अन् मौनावर घालू बंदी                ॥ धृ ॥ 

नको नदी, अन् नकोच सागर.. स्वस्थ बसू इथल्या बाकावर 
झटकुन टाकू रुसवा-फुगवा, राग साचलेला नाकावर 
पुसून टाकू गतकाळाच्या समज-गैरसमजांच्या नोंदी         ॥ १ ॥ 

गरम चहाने सुरू करूया थंडावलेल्या अपुल्या गप्पा 
घोटागणिक चहाच्या उघडू अलगद बंद मनाचा कप्पा 
इवलासा संवाद आजचा नव्या उद्याची ठरेल नांदी           ॥ २ ॥ 

गंधासोबत ऊब चहाची हळू भिनू दे मनी खोलवर 
विसरुन जाऊ कटुत्व सारे, जशी विरघळे चहात साखर 
तुझ्या गोड स्मितहास्याने वाटेल चहाही जणु बासुंदी         ॥ ३ ॥ 

- अनामिक 
(२५-२८/०४/२०१७) 

20 अप्रैल 2017

डगर

सांझ शीतल, छाँव की चुनरी लपेटे है डगर 
चल पडे हैं बेसबब हम दो, जहाँ से बेखबर 

बुलंद पेडों का सजा है शामियाना स्वागत करने 
डालियों की खिडकियों से छू रही हैं नर्म किरनें 

रासतेभर सुर्ख पत्तों का बिछा कालीन है 
सावली परछाइयाँ भी दिख रही रंगीन हैं 

तितलियों के भेस में कुछ ख्वाब नाजुक उड रहे हैं 
सुर मधुर चंचल पवन की बांसुरी से छिड रहे हैं 

हाथ थामा है तुम्हारा, यूँ लगे रेशम छुआ है 
तेज पहिया वक्त का तुम संग लगे मद्धम हुआ है 

खत्म भी हो, या न हो अब ये डगर, ना है फिकर 
यूँ ही रहो तुम हमकदम, चलते रहेंगे उम्रभर 

- अनामिक 
(१०/०१/२०१७ - २०/०४/२०१७) 

13 अप्रैल 2017

मोल

हर शहर की ही तरह इस शहर से भी खामखा
एक तोहफा ले लिया है फिर तुम्हारे नाम का

ये जानकर भी की तुम्हे इसकी कदर तो है नही
पर क्या करू ? आदत कहो, खुद की तसल्ली ही सही

संदूक में ही बंद रखू, तुम तक न पहुँचाऊ अभी
घर-वापसी की तो न नौबत आएगी उसपर कभी

छोड भी दो मेरे, तोहफे के मगर जजबात हैं
उनका समझना मोल ना बस की तुम्हारे बात है

- अनामिक
(११-१३/०४/२०१७)

03 अप्रैल 2017

बस एक कदम

जल कितना भी हो अंबर में, बिन बादल कैसे बारिश हो ?
मैं लाख जतन भी कर लू, पर.. तुमसे भी तो कुछ कोशिश हो 

तुम एक कदम बस चल आओ, मैं तै सैंकडों मकाम करू 
तुम एक घडी दो फुरसत की, दिन-रैन तुम्हारे नाम करू 

तुम एक संदेसा भेजो बस, मैं बाढ चिठ्ठियों की लाऊ 
तुम एक पुकार लगाओ बस, मैं पार जलजलें कर आऊ 

तुम एक लब्ज ही कह दो बस, मैं नज्मों की बरसात करू 
तुम एक दफा बस मुस्काओ, मैं खुद होकर शुरुआत करू 

पर कम से कम वो एक कदम अब तुम्हे ही उठाना होगा 
मैं खोलूंगा दर झटके में, पर तुम्हे खटखटाना होगा 

मैं मीलों चल आया हूँ अब तक, थमना अभी जरूरी है 
पग में जमीर की बेडी है, जिसकी न मुझे मंजूरी है 

- अनामिक 
(२८/०३/२०१७ - ०३/०४/२०१७) 

27 मार्च 2017

पहचान

मैं चाँद झिलमिल, तुम छलकती चाँदनी 
मैं मेघ रिमझिम, तुम चमकती दामिनी 
मैं गीत दिलकश, तुम सुरीली रागिनी 
मैं दीप जगमग, तुम सुनहरी रोशनी 

अधूरी सी तुम्हारे जिक्र बिन पहचान है मेरी 
तुम्हारी ही कहानी में ढली दास्तान है मेरी  ॥ धृ ॥ 

बेताब साहिल मैं, लहर सी चुलबुली हो तुम 
मैं बावरा जुगनू, तितली मनचली हो तुम 
उम्मीद हो तुम, मैं तुम्हारा हौसला 
पंछी निडर तुम, मखमली मैं घोंसला 

तुम्हारे नर्म पंखों से बुलंद उडान है मेरी 
अधूरी सी तुम्हारे जिक्र बिन पहचान है मेरी ॥ १ ॥ 

तकदीर में मेरी लिखी हो तुम लकीरों सी 
मेरी मुसाफिर कश्तियों को तुम जजीरों सी 
तुम हो सियाही कल्पना की, मैं कलम 
इक-दूसरे संग ही मुकम्मल है जनम 

तुम्हारी ही खुशी के संग जुडी मुस्कान है मेरी 
अधूरी सी तुम्हारे जिक्र बिन पहचान है मेरी ॥ २ ॥ 

- अनामिक 
(०९/०८/२०१५ - २७/०३/२०१७) 

21 मार्च 2017

आओ अब कुछ बात करे ?

चुप्पी-चुप्पी खेल-खेलकर अगर भर गया होगा जी तो
आओ अब कुछ बात करे ?
अजनबियों के जैसे रहकर अगर तसल्ली मिल गयी हो तो
फिर से इक शुरुआत करे ?                          ॥ धृ ॥

कुछ शिकवें मैं रखू जेब में
कुछ शिकायतें तुम दफना दो
कुछ कसूर हम माफ करे
        मुस्कुराहटों की मखमल से
        चेहरों से नाराजगी भरी
        धूल झटककर साफ करे
अंजाने में खडी हुई इन खामोशी की दीवारों पर
लब्जों का आघात करे ?
आओ अब कुछ बात करे ?                          ॥ १ ॥

फाड फेंक दे बिगडे किस्सें
गलतफहमियों के सब पन्नें
अतीत की उस किताब से
        अनबन के नुकसान-फायदें
        कडवाहट की फिजूलखर्ची
        चलो मिटा दे हिसाब से
रंजिश की रूखी धरती पर अपनेपन की चंद बूँदों की
हलकी सी बरसात करे ?
आओ अब कुछ बात करे ?                          ॥ २ ॥

- अनामिक
(२०/०२/२०१७ - २१/०३/२०१७)

18 मार्च 2017

आज भी

धूल रिश्तों पे जमी जो, मैं हटा पाता नही 
काँच सी बिखरी पडी यादें जुटा पाता नही 

फिक्र तो है आज भी, जितनी हुआ करती थी कल 
फर्क है बस, पहले जैसे अब जता पाता नही 

आज भी सुनने सुनाने बाकी हैं बातें कई 
पूछ पर पाता नही कुछ, कुछ बता पाता नही 

फासलें ये दो जहाँ के, दो कदम ही तो नही ? 
बढ न जाए और, इस डर से घटा पाता नही 

बंद है दर.. दस्तकों से खुल भी जाए, क्या पता ? 
ना खुला तो ? सोचकर दर खटखटा पाता नही 

- अनामिक 
(१८/०३/२०१७)

07 फ़रवरी 2017

पुन्हा मी वाचले सारे

पुन्हा मी वाचले सारे तुझ्या डोळ्यात दडलेले
पुन्हा मी ऐकले गाणे तुझ्या ओठात अडलेले     ॥ धृ ॥

मला बघताच हास्याची कळी हलकेच फुलणारी
जरा नजरानजर होता खळी गालात खुलणारी
पुन्हा टिपले मी ​चेहऱ्यावर गुलाबी रंग चढलेले
पुन्हा मी वाचले सारे..                           ॥ १ ॥

भिडे या अंतरी जर सूर त्या हळुवार स्पंदांचा
कळे जर अर्थ मौनाचा, कशाला भार शब्दांचा ?
खुणावे पापण्यांना द्वार स्वप्नांचे उघडलेले
पुन्हा मी वाचले सारे..                           ॥ २ ॥

- अनामिक
(०६/०१/२०१७ - ०७/०२/२०१७)

15 जनवरी 2017

संक्रांत

घुसमट सारी आज संपवू, किती रहावे शांत अता ? 
मिटवूया चल अपुल्यातल्या अबोल्याची संक्रांत अता ॥ धृ ॥ 

गुळाएवढा गोड नको, पण 
तिळाएवढा शब्द तरी 
नकोत गप्पा दिलखुलास, पण 
तुटकासा संवाद तरी 
पुष्कळ झाले रुसवे-फुगवे, नको बघूया अंत अता     ॥ १ ॥ 

पतंग माझ्या खुळ्या मनाचा 
तुझ्याच गगनी भिरभिरतो 
मांजा तुटला तरी वाट हा 
तुझ्या अंगणाची धरतो 
पुन्हा जोडुनी तुटके धागे करू नवी सुरुवात अता     ॥ २ ॥ 

- अनामिक 
(१४,१५/०१/२०१७)

13 जनवरी 2017

राही

चले तेज इस कदर जिंदगी, थमने की न इजाजत है 
बिता सकू इक मकाम ज्यादा समय, न इतनी फुरसत है 

नयी मंजिलें, नये नजारों की नजरों को दावत है 
चलू अकेला, बने काफिला.. जो भी आए, स्वागत है 

जिसको जुडना है, जुड जाए.. जिसको मुडना है, मुड जाए 
मैं तो अपनी राह चलूंगा, कदम जिस दिशा बढ जाए 

हाँ, रुक जाता हूँ उसकी खातिर, जिसे हमसफर बना सकू 
इक बार रुकू, दो बार.. मगर नामुमकिन है सौ बार रुकू 

- अनामिक 
(२९/१२/२०१६ - १३/०१/२०१७)

06 जनवरी 2017

सौगात जाया हो गयी

उस सांझ छेडी अनकही वो बात जाया हो गयी 
मन में सजी ख्वाबों की वो बारात जाया हो गयी 

वो साफ दिल से पेश की सौगात जाया हो गयी 
उसको सजाने में जगी वो रात जाया हो गयी 

वो बंद मुठ्ठी में छुपी कायनात जाया हो गयी 
दिल से लिखी दास्तान की शुरुवात जाया हो गयी 

वो कोशिशें, शिद्दत, जतन, जजबात जाया हो गये 
उस रात आँखों से गिरी बरसात जाया हो गयी 

- अनामिक 
(०४-०६/०१/२०१७) 

05 जनवरी 2017

बचपना

यूँ सूझा है आज बचपना, दर्या किनारे आया हूँ
बचपन के सब खेल सलोने यादों के संग लाया हूँ

देखो मेरा रेत का महल, सजा रही हैं शंख-सीपियाँ
लहरों की गोदी में तैर रही है वो कागज की नैया

वहा हवा संग गपशप करते उंगली से बांधे गुब्बारें
कैद बुलबुलों में साबुन के उडे जा रहे सपनें न्यारे

वहा गगन में मेघों के संग लडा रही है पेंच पतंग
नाम लिखे हैं साहिल पे जो, चूम रही है शोख तरंग

बचपन की उन यादों को बचपन में ही क्यों कैद रखे ?
क्यों न बडे होकर भी उनका नये सिरे से स्वाद चखे ?

- अनामिक
(१०/१२/२०१६ - ०५/०१/२०१७)

04 जनवरी 2017

कधीतरी वाटेलच की

हास्याचे उसने कारंजे कधीतरी आटेलच की
धीर संयमाचा मुखवटा कधीतरी फाटेलच की

गोष्ट संपली अर्ध्यातच, समजून अचानक मिटलेले
पुस्तक ते उघडून पहावे, कधीतरी वाटेलच की

किती नद्या अडवून ठेवल्या डोळ्यांच्या धरणांनी, पण
तळे पापण्यांच्या काठावर कधीतरी साठेलच की

किती पळावे सशासारखे शर्यतीत नवस्वप्नांच्या
आठवणींचे हळवे कासव कधीतरी गाठेलच की

सहज मिसळतो, रमतो हल्ली अनोळख्यांच्याही गर्दीत
घोळक्यातही त्या एकाकी कधीतरी वाटेलच की

पुन्हा नव्याने खुल्या गळ्याने जीवनगाणे गाइनही
चुकून येता सूर जुने ओठात कंठ दाटेलच की

- अनामिक
(०२-०४/०१/२०१७)

31 दिसंबर 2016

ऐ गुजरते साल

ऐ गुजरते साल, तुमने बिन कहे क्या कुछ दिया 
लब्ज भी कम पड रहे करने तुम्हारा शुक्रिया 

कुछ पुराने दोस्त छूटे, कुछ नये साथी मिले 
कुछ सुहाने ख्वाब रूठे, कुछ हसीं सपनें खिले 

बेजान कविता, शायरी को मिल गयी संजीवनी 
दिलकश धुनें खामोश मन को फिर लगी हैं सूझनी 

घूमने के शौक ने भी मंजिलें ढूँढी नयी 
और भीतर के मुसाफिर ने मकाम पाए कई 

हाँ ठीक है, जाते हुए तुमने भिगाए नैन है 
पर लबों की ये हसी भी तो तुम्हारी देन है 

- अनामिक 
(३०,३१/१२/२०१६)